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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Vasant Bhag 3 Chapter 11 जब सिनेमा ने बोलना सीखा
  • NCERT Solution For Class 8 Hindi Vasant Bhag 3

    जब सिनेमा ने बोलना सीखा Here is the CBSE Hindi Chapter 11 for Class 8 students. Summary and detailed explanation of the lesson, including the definitions of difficult words. All of the exercises and questions and answers from the lesson's back end have been completed. NCERT Solutions for Class 8 Hindi जब सिनेमा ने बोलना सीखा Chapter 11 NCERT Solutions for Class 8 Hindi जब सिनेमा ने बोलना सीखा Chapter 11 The following is a summary in Hindi and English for the academic year 2023-24. You can save these solutions to your computer or use the Class 8 Hindi.

    Question 1
    CBSEENHN8000792

    जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।

    Solution

    जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर लिखा था-’वे सभी सजीव हैं. सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए; उनको बोलते; बातें करते देखो।’
    ‘अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए’ यह पंक्ति दर्शाती है कि फिल्म में अठहत्तर चेहरे थे अर्थात् फिल्म में अठहत्तर लोग काम कर रहे थे।

    Question 10
    CBSEENHN8000801

    उपसर्ग और प्रत्यय दोनों ही शब्दांश होते हैं। वाक्य में इनका अकेला प्रयोग नहीं होता। इन दोनों में अंतर केवल इतना होता है कि उपसर्ग किसी भी शब्द में पहले लगता है और प्रत्यय बाद में। हिंदी के सामान्य उपसर्ग इस प्रकार हैं-अ/अन, नि, दु, क/कु, स/सु, अध, बिन, औ आदि।
    पाठ में आए उपसर्ग और प्रत्यय युक्त शब्दों के कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं-
    मूल शब्द      उपसर्ग       प्रत्यय        शब्द
    वाक्            स            -             सवाक्
    लोचन          सु            आ            सुलोचना
    फिल्म          -             कार          फिल्मकार
    कामयाब        -             ई             कामयाबी
    इस प्रकार के 15-15 उदाहरण खोजकर लिखिए और अपने सहपाठियों को दिखाइए।

    Average
    Question 27
    CBSEENHN8000818

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    ‘वे सभी सजीव हैं. सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।’ देश की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म ‘आलम आरा’ के पोस्टरों पर विज्ञापन की ये पंक्तियाँ लिखी हुई थीं। 14 मार्च 1931 की वह ऐतिहासिक तारीख भारतीय सिनेमा में बड़े बदलाव का दिन था। इसी दिन पहली बार भारत के सिनेमा ने बोलना सीखा था। हालाँकि वह दौर ऐसा था जब मूक सिनेमा लोकप्रियता के शिखर पर था।

    ‘सवाक्’ शब्द से क्या तात्पर्य है?
    • पूरी तरह समझ आने वाली
    • बोलने वाली
    • विचारों का आदान-प्रदान करने वाली
    • अधिक अभिनेता-अभिनेत्रियों वाली

    Easy
    Question 28
    CBSEENHN8000819

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    ‘वे सभी सजीव हैं. सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।’ देश की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म ‘आलम आरा’ के पोस्टरों पर विज्ञापन की ये पंक्तियाँ लिखी हुई थीं। 14 मार्च 1931 की वह ऐतिहासिक तारीख भारतीय सिनेमा में बड़े बदलाव का दिन था। इसी दिन पहली बार भारत के सिनेमा ने बोलना सीखा था। हालाँकि वह दौर ऐसा था जब मूक सिनेमा लोकप्रियता के शिखर पर था।

    ‘आलम आरा’ फिल्म के पोस्टरों पर क्या लिखा था?
    • अठहत्तर मुर्दा जिंदा होना।
    • फिल्म में सबका बोलना।
    • फिल्म में सबका चलना-फिरना।
    • वे सभी सजीव हैं, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं. अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखें।

    Easy
    Question 29
    CBSEENHN8000820

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    ‘वे सभी सजीव हैं. सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।’ देश की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म ‘आलम आरा’ के पोस्टरों पर विज्ञापन की ये पंक्तियाँ लिखी हुई थीं। 14 मार्च 1931 की वह ऐतिहासिक तारीख भारतीय सिनेमा में बड़े बदलाव का दिन था। इसी दिन पहली बार भारत के सिनेमा ने बोलना सीखा था। हालाँकि वह दौर ऐसा था जब मूक सिनेमा लोकप्रियता के शिखर पर था।

    ‘अठहत्तर मुर्दा जिंदा होना’ शब्दों का प्रयोग किसके लिए हुआ?


    • अठहत्तर जीवित लोग, जो चल-फिर व बोल सकते थे।
    • अठहत्तर लोगों की फिल्म
    • अठहत्तर किरदार जिन्होंने फिल्म में काम किया।
    • दिए गए सभी।

    Easy
    Question 30
    CBSEENHN8000821

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    ‘वे सभी सजीव हैं. सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।’ देश की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म ‘आलम आरा’ के पोस्टरों पर विज्ञापन की ये पंक्तियाँ लिखी हुई थीं। 14 मार्च 1931 की वह ऐतिहासिक तारीख भारतीय सिनेमा में बड़े बदलाव का दिन था। इसी दिन पहली बार भारत के सिनेमा ने बोलना सीखा था। हालाँकि वह दौर ऐसा था जब मूक सिनेमा लोकप्रियता के शिखर पर था।

    14 मार्च 1931 को ऐतिहासिक तारीख क्यों माना जाता है।

    • क्योंकि इस दिन ‘आलम आरा’ फिल्म पुरस्कृत हुई।
    • क्योंकि इस दिन लोगों ने पहली बार हिंदी सिनेमा को सराहा।
    • क्योंकि इस दिन भारतीयों ने पहली फिल्म पर्दे पर दिखाई।
    • क्योंकि इस दिन भारतीयों द्वारा पहली बोलने वाली फिल्म पर्दे पर दिखाई गई।

    Easy
    Question 37
    CBSEENHN8000828
    Question 38
    CBSEENHN8000829

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    यह फिल्म 14 मार्च 1931 को मुंबई के ‘मैजेस्टिक’ सिनेमा में प्रदर्शित हुई। फिल्म 8 सप्ताह तक ‘हाउसफुल’ चली और भीड़ इतनी उमड़ती थी कि पुलिस के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाया करता था। समीक्षकों ने इसे ‘भड़कीली फैंटेसी’ फिल्म करार दिया था मगर दर्शकों के लिए यह फिल्म एक अनोखा अनुभव थी। यह फिल्म 10 हजार फुट लंबी थी और इसे चार महीनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया गया था।

    इस फिल्म के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया क्या रही?
    • लोगों ने इसे बहुत पसंद किया। आठ सप्ताह तक हाउसफुल चला।
    • लोग इससे ऊब गए।
    • लोगों को बोलती फिल्म समझ नहीं आई।
    • इसमें से कोई नहीं।

    Easy
    Question 39
    CBSEENHN8000830

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    यह फिल्म 14 मार्च 1931 को मुंबई के ‘मैजेस्टिक’ सिनेमा में प्रदर्शित हुई। फिल्म 8 सप्ताह तक ‘हाउसफुल’ चली और भीड़ इतनी उमड़ती थी कि पुलिस के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाया करता था। समीक्षकों ने इसे ‘भड़कीली फैंटेसी’ फिल्म करार दिया था मगर दर्शकों के लिए यह फिल्म एक अनोखा अनुभव थी। यह फिल्म 10 हजार फुट लंबी थी और इसे चार महीनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया गया था।

    इस फिल्म को ‘भड़कीली फैंटेसी’ क्यों कहा गया?
    • क्योंकि कलाकार जोर-जोर से बोल रहे थे।
    • ध्वनि व कृत्रिम प्रकाश के साथ-साथ बोलने वाली फिल्म लोगों की भावनाओं को उद्वेलित करने वाली थी।
    • लोग इस फिल्म को देखकर भड़क गए।
    • यह मौज-मस्ती के अलावा कुछ भी नहीं थी।

    Easy
    Question 40
    CBSEENHN8000831

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    यह फिल्म 14 मार्च 1931 को मुंबई के ‘मैजेस्टिक’ सिनेमा में प्रदर्शित हुई। फिल्म 8 सप्ताह तक ‘हाउसफुल’ चली और भीड़ इतनी उमड़ती थी कि पुलिस के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाया करता था। समीक्षकों ने इसे ‘भड़कीली फैंटेसी’ फिल्म करार दिया था मगर दर्शकों के लिए यह फिल्म एक अनोखा अनुभव थी। यह फिल्म 10 हजार फुट लंबी थी और इसे चार महीनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया गया था।

    इस फिल्म की रील कितनी लंम्बी थी? इसे बनने में कितना समय लगा?


    • यह पंद्रह हजार फुट लंबी थी छ: महीने में बनाया गया।
    • यह दस हजार फुट लंबी थी इसे चार महीनों में बनाया गया।
    • यह पद्रंह हजार फुट लम्बी थी इसे चार महीनों में बनाया गया।
    • यह दस हजार फुट लंबी थी इसे पांच महीनें में बनाया गया।

    Easy
    Question 41
    CBSEENHN8000832

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया. सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता- अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था। अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नज़र आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्य़ादा देसी हुआ। एक तरह की नयी आजादी थी जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।

    सिनेमा को पड़े-लिखे अभिनेता-अभिनेत्रियों की आवश्यकता क्यों पड़ी?


    • क्योंकि फिल्मों की भाषा कलिष्ट थी।
    • क्योंकि संवाद बोलने व गायन हेतु भाषा स्पष्टता की जरूरत थी।
    • क्योंकि फिल्मों में पढ़ना भी पड़ता था।
    • इनमें से कोई नहीं।

    Easy
    Question 42
    CBSEENHN8000833

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
    जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया. सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता- अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था। अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नज़र आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्य़ादा देसी हुआ। एक तरह की नयी आजादी थी जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।

    मूक फिल्मों में कैसे अभिनेता का चयन होता था?




    • एक दम मंजीदा
    • बहुत अधिक पढ़े-लिखे
    • पहलवान जैसे शरीर वाले, करतब दिखाने वाले और उछल-कूद करने वाले।
    • बोल-चाल की भाषा बोलने वाले।

    Easy
    Question 43
    CBSEENHN8000834

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया. सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता- अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था। अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नज़र आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्य़ादा देसी हुआ। एक तरह की नयी आजादी थी जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।

    सिनेमा में भाषा का बदलाव कैसे आया?


    • हिंदी-उर्दू भाषा का विकास हुआ।
    • बोलने वाली फिल्में होने के कारण भाषा के हाव-भाव परखे जाने लगे।
    • भाषा की संजीदगी की और ध्यान दिया जाने लगा।
    • दिए गए सभी।

    Easy
    Question 44
    CBSEENHN8000835

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया. सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता- अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था। अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नज़र आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्य़ादा देसी हुआ। एक तरह की नयी आजादी थी जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।

    सिनेमा में किस भाषा को बढ़ावा दिया गया।
    • हिंदी-उर्दू भाषा को
    • हिंदी-अंग्रेजी भाषा को
    • हिंदी पंजाबी भाषा को
    • हिंदी-कन्नड़ भाषा को

    Easy
    Question 45
    CBSEENHN8000836

    निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए -जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया. सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता- अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था। अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नज़र आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्य़ादा देसी हुआ। एक तरह की नयी आजादी थी जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।

    फिल्मों का स्वरूप कैसे बदला?
    • अब फिल्मों में लोगों की आम भावनाओं को दर्शाया जाने लगा।
    • अब फिल्में दैनिक व सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करने लगी।
    • अब फिल्मों का प्रभाव लोगों के जीवन पर पड़ने लगा।
    • दिए गए सभी।

    Easy