विद्रोही और राज

  • Question 5
    CBSEHHIHSH12028342

    एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?

    Solution

    हम पाठ्यपुस्तक के चित्र नं 18 को इस अध्याय में से चुनते हैं। यह चित्र हमें बताता है की अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध केवल पुरुष ही नहीं लड़ें बल्कि स्त्रियों के रूप में अनेक लोग रहे जैसे की लक्ष्मीबाई वीर महिलाओं का प्रतीक थीं।

    स्रोत नं.1: 1857 के विद्रोह के दौरानी दिल्ली और अन्य शहरों में खूब उथल-पुथल हुआ। लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हुआ। उनकी सामान्य गतिविधियाँ अस्तव्यस्त हो गई। सब्जियों के भाव आसमान छूने लगे। जीवन की आवश्यकता वस्तुओं का अभाव हो गया। या तो सब्जियाँ लोगों को मिलती नहीं थी और कहीं दिखाई देती थीं तो वे बासी होती थीं। अनेक लोगों ने अपना काम छोड़ दिया जैसे पानी भरने वाले लोगों ने पानी भरना छोड़ दिया। पानी भरने का काम कुलीन लोगों के लिए पीडाजनक था। कई बेचारे भद्रजन अपना काम करने के लिए खुद मजबूर हुए।


    स्रोत नं. 2: इसमें हमें विजेताओं और पराजितों के बारे में निम्न जानकारी मिलती है। विद्रोह का कारण सैनिक अवज्ञा के रूप में शुरू हुआ। भारतीय मूल के लोग जो इसाई थे वे चाहे कम्पनी की पुलिस की नौकरी कररहे हों वे भी ब्रिटिश मजिस्ट्रेटों और आधिकारियों के शक के दायरे में आ गए। जो सिपाही शिष्टाचारवश एक मुस्लिम मजिस्ट्रेट से मिलने गया जो की सिपाही सिस्टन अवध में तैनात था। मजिस्ट्रेट नेसिपाही से अवध के हालात जानने की कोशिश की। उसने कहा यदि उसे अवध में काम मिला है तो उसे वहाँ की स्थिति के बारे में अंग्रेज अधिकारीयों को समयसमय पर ठीक जानकारी दे दिजाएगी। अंग्रेज अधिकारी को मुस्लिम तहसीलदार ने अंग्रेज सिपाहियों को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया की चाहे विद्रोही कुछ भी दावा करें, शुरू में वे कामयाब भी रहें पर अंततः विजय अंग्रेजी सरकार या कम्पनी सरकार की होगी,मगर बाद में पता चला की वह मुस्लिम तहसीलदार जो मजिस्ट्रेट के कमरे में प्रवेश कर रहा था वह बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था।

    Question 6
    CBSEHHIHSH12028343

    उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?

    Solution

    विद्रोह से सम्बन्धित विभिन्न स्रोतो से हमें यह प्रमाण मिलते हैं कि सिपाही विद्रोह को योजनाबद्ध एवं समन्वित तरीके से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। विभिन्न छावनियों में विद्रोही सिपाहियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान था। 'चर्बी वाले कारतूसों' की बात सभी छावनियों में पहुँच गई थी।
    बरहमपुर से शुरू होकर बैरकपुर और फिर अंबाला और मेरठ में विद्रोह की चिंगारियाँ भड़की। इसका अर्थ यह निकला जा सकता हैं की सूचनाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच रही थी। सिपाही बगावत के मनसूबे गढ़ रहे थे।

    इसका एक और उदाहरण यह है कि जब मई की शुरुआत में सातंवी अवध इर्रेगुलर कैविटी ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा: 'हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के के हुक्म का इंतजार कर रहे हैं।'
    सिपाहियों की बैठकों के भी कुछ सुराग हमें मिलते हैं। हालांकि बैठकों में वे कैसी योजनाएँ बनाते थे, उसके प्रमाण नहीं है। फिर भी कुछ अंदाज़े लगाए जाते हैं कि इन सिपाहियों का दुःख-दर्द तक एक जैसा था। अधिकांश उच्च-जाति के थे और उनकी जीवन-शैली भी मिलती जुलती थी। स्वाभाविक है कि वे अपने भविष्य के बारे में ही निर्णय लेते होंगे। इस विद्रोह के आरंभिक इतिहासकारों में से एक चार्ल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायते रात को कानपुर सिपाही लाइनों में होती थी जिनमें मिलिट्री पुलिस के कप्तान कैप्टन 'कप्तान हियर्से' की हत्या के लिए 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों ने उन भारतीय सिपाहियों पर दबाव डाला, जो उस कप्तान की सुरक्षा के लिए तैनात थे।

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