विचारक विश्वास और इमारतें

  • Question 5
    CBSEHHIHSH12028279

    आपके अनुसार स्त्री पुरुष संघ में क्यों जाते थे?

    Solution

    बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए महात्मा बुद्ध ने बौद्ध संघ की स्थापना की। बौद्ध संघ महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित एक धार्मिक व्यवस्था भी थी। अतः इसमें स्त्री-पुरुष निम्नलिखित कारणों से शामिल हुए:

    1. बौद्ध संघ की व्यवस्था समानता पर आधारित थी। इसमें किसी वर्ण, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था। संघ का संगठन गणतंत्रात्मक प्रणाली पर आधारित था।
    2. शुरू में संघ में स्त्रियों को भी शामिल नहीं किया गया था परंतु बाद में स्त्रियों को भी संघ का सदस्य बनाया गया। वे भी बौद्ध धर्म की ज्ञाता बनीं।
    3. बौद्ध धर्म के शिक्षक- शिक्षिकाएँ बनने के लिए स्त्री-पुरुष संघ के सदस्य बने थे। वे बौद्ध धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन करते थे ताकि उनकी शिक्षाओं का प्रचार प्रसार कर सकें।

    Question 6
    CBSEHHIHSH12028280

    साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?

    Solution

    साहित्य ग्रंथों के व्यापक अध्ययन से प्राचीन मूर्तिकला के अर्थ को समझाया जा सकता है। यह बात साँची स्तूप की मूर्तिकला के संदर्भ में भी लागू होती है। इसलिए इतिहासकार साँची की मूर्ति गाथाओं को समझने के लिए बहुत साहित्यिक परंपरा के ग्रंथों का गहन अध्ययन करते हैं। बहुत बार तो साहित्यिक गाथाएँ ही पत्थर में मूर्तिकार द्वारा उभारी गई होती है। साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य काफी हद तक सहायक है; जैसे कि नीचे दिए गए उदहारणों से स्पष्ट होता है -

    1. वेसान्तर जातक की कथा: साँची के उत्तरी तोरणद्वार के एक हिस्से में एक मूर्तिकला अंश को देखने से लगता है कि उसमें ग्रामीण दृश्य चित्रित किया गया है। परंतु यह दृश्य वेसान्तर जातक की कथा से है, जिसमें एक राजकुमार अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंपकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वनों में रहने के लिए जा रहा है। अतः स्पष्ट है कि जिस व्यक्ति को जातक कथाओं का ज्ञान नहीं होगा वह मूर्तिकला के इस अंश को नहीं जान पाएगा।
    2. प्रतीकों की व्याख्या: मूर्तिकला में प्रतीकों को समझना और भी कठिन होता है। इन्हें तो बौद्ध परंपरा के ग्रंथों को पढ़े बिना समझा ही नहीं जा सकता। साँची में कुछ एक प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बौद्ध वृक्ष के नीचे ज्ञान-प्राप्ति वाली घटना को प्रतीकों के रूप में दर्शाने का प्रयत्न किया है। बहुत से प्रतीकों में वृक्ष दिखाया गया है, लेकिन कलाकार का तात्पर्य संभवतया इनमें एक पेड़ दिखाना नहीं रहा, बल्कि पेड़ बुद्ध के जीवन की एक निर्णायक घटना का प्रतीक था।
      इसी तरह साँची की एक और मूर्ति में एक वृक्ष के चारों ओर बौद्ध भक्तों को दिखाया गया है। परंतु बीच में जिसकी वे पूजा कर रहे हैं वह महात्मा बुद्ध का मानव रूप में चित्र नहीं है, बल्कि एक खाली स्थान -दिखाया गया है- यही रिक्त स्थान बुद्ध की ध्यान की दशा का प्रतिक बन गया।

    अत: स्पष्ट है की मूर्तिकला में प्रतीकों अथवा चिह्रों को समझने के लिए बौद्ध ग्रंथों का अध्यन होना चाहिए। यहाँ यह भी ध्यान रहे की केवल बौद्ध ग्रंथो के अध्यन से ही साँची की सभी मूर्तियों को नहीं समझा जा सकता। इसके लिए तत्कालीन अन्य धार्मिक परंपराओं और स्थानीय परंपराओं को ज्ञान होना भी जरुरी है, क्योंकि इसमें लोक परंपराओं का समावेश भी हुआ है। उत्कीर्णित सर्प, बहुत-से जानवरों के मूर्तियाँ तथा सालभंजिका की मूर्तियाँ इत्यादि इसके उदहारण है।

    Question 7
    CBSEHHIHSH12028281

    चित्र 1 और चित्र 2 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नज़र आता है? वास्तुकला,पेड़-पौधे और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन-से ग्रामीण और कौन-से शहरी परिदृश्य हैं?

    Solution

    साँची के स्तूप में मूर्तिकला के उल्लेखनीय नमूने देखने को मिलते हैं। इनमें जातक कथाओं को उकेरा गया है, साथ ही बौद्ध परंपरा के प्रतीकों को भी उभारा गया है, यहाँ तक कि अन्य स्थानीय परंपराओं को शामिल किया गया है।


    चित्र I और II में भी बौद्ध परंपरा से जुड़ी धारणाओं को उकेरा गया है।
    चित्र I को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें अनेक पेड़-पौधे और जानवरों को दिखाया गया है। दृश्य ग्रामीण परिवेश का लगता है। लेकिन बौद्ध धर्म की दया, प्रेम और अहिंसा की धारणाएँ इसमें स्पष्ट झलकती हैं। चित्र के ऊपरी भाग में जानवर निश्चिंत भाव से सुरक्षित दिखाई दे रहे हैं, जबकि निचले भाग में कई जानवरों के कटे हुए सिर और धनुष-बाण लिए हुए मनुष्यों के चित्र हैं, जो बलि प्रथा और शिकारी-जीवन, हिंसा को प्रकट करते हैं।
    चित्र-II बिल्कुल अलग परिदृश्य को व्यक्त कर रहा है। संभवत: यह कोई बौद्ध संघ का भवन है जिसमें बौद्ध भिक्षु ध्यान और प्रवचन जैसे कार्यों में व्यस्त हैं। चित्र में उकेरा गया सभाकक्ष और उसके स्तंभों में भी बौद्ध धर्म के प्रतीक दिखाई दे रहे हैं। स्तंभों के ऊपर हाथी और दूसरे जानवर बने हैं। ध्यान रहे इनसे जुड़े साहित्य का यदि हम अध्ययन करें तो संभवत: इन चित्रों का और भी गहन अर्थ निकालने में सक्षम हो पाएँगे। 

    Question 8
    CBSEHHIHSH12028282

    वैष्णववाद और शेववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।

    Solution

    लगभग 600 ईसा पूर्व से 600 ई० के मध्य वैष्णववाद और शैववाद का विकास हुआ। इसे हिंदू धर्म या पौराणिक हिंदू धर्म भी कहा जाता है। इन दोनों नवीन विचारधाराओं की अभिव्यक्ति मूर्तिकला और वास्तुकला के माध्यम से भी हुई । इस संदर्भ में मूर्तिकला और वास्तुकला के विकास का परिचय निम्नलिखित है:

    1. मूर्तिकला: बौद्ध धर्म की महायान शाखा की भाँति पौराणिक हिंदू धर्म में भी मूर्ति-पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। भगवान विष्णु व उनके अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया। अन्य देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ बनाई गईं। प्राय: भगवान् को उनके प्रतीक लिंग के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन कई बार उन्हें मानव रूप में भी दिखाया गया । विष्णु की प्रसिद्ध प्रतिमा देवगढ़ दशावतार मंदिर में मिली है। इसमें उन्हें शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए दिखाया गया है। कुंडल, मुकुट वा माला आदि पहने हैं। इसके एक और शिव तथा दूसरी और इंद्र की प्रतिमाएँ है। नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा विराजमान हैं। लक्ष्मी विष्णु के चरण दबा रही हैं। वराह पृथ्वी को प्रलय से बचाने के लिए दाँतों पर उठाए हुए हैं। पृथ्वी को भी नारी रूप में दिखाया गया है। गुप्तकालीन शिव मंदिरों में एक-मुखी और चतुर्मुखी शिवलिंग मिले हैं।
    2. वास्तुकला: वैष्णववाद और शैववाद के अंतर्गत मंदिर वास्तुकला का विकास हुआ। संक्षेप में, शुरुआती मंदिरों के स्थापत्य (वास्तुकला) की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार है:

      1. मंदिरों का प्रारंभ गर्भ-गृह (देव मूर्ति का स्थान) के साथ हुआ। यह चौकोर कमरे थे। इनमें एक दरवाजा होता था, जिसमें उपासक पूजा के लिए भीतर जाते थे। गर्भ-गृह के द्वार अलंकृत थे।

      2. धीरे धीरे गर्भ ग्रह के ऊपर एक ऊँचा ढांचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था।

      3. शुरुआती मंदिर ईंटों से बनाए गए साधारण भवन हैं, लेकिन गुप्त काल तक आते-आते स्मारकीय शैली का विचार उत्पन्न हो चुका था, जो आगमी शताब्दियों में भव्य पाषाण मंदिरों के रूप में अभिव्यक्त हुआ। इनमें ऊंची दीवारें, तोरणद्वार और विशाल सभास्थल बनाए गए, यहाँ तक कि जलापूर्ति का प्रबंध भी किया गया।

         

      4. पूरी एक चट्टान को तराशकर मूर्तियों से अलंकृत पूजा-स्थल बनाने की शैली भी विकसित हुई। उदयगिरी का विष्णु मंदिर इस शैली से बनाया गया। इस संदर्भ में महाबलीपुरम् के मंदिर भी विशेष उल्लेखनीय है।

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