शमशेर बहादुर सिंह

  • Question 25
    CBSEENHN12026243

    निम्नलिखित काव्याशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कीजिए-
    नील जल में या
    किसी की गौर, झिलमिल देह जैसे
    हिल रही हो।
    और-
    जादू टूटता है इस उषा का अब:
    सुर्योदय हो रहा है।

    1. कवि ने इस काव्याशं में किसकी झलक प्रस्तुत की है?
    2. नीले जल में कवि की कल्पना को स्पष्ट करो।
    3. काव्याशं के शिल्प-सौदंर्य पर प्रकाश डालिए।


    Solution

    1. इन पंक्तियों में सूर्योदय की वेला के प्राकृतिक सौंदर्य की मनोहारी झलक प्रस्तुत की गई है। आकाश में क्षण-क्षण परिवर्तित होते सौंदर्य के रूप-चित्रण में कवि को सफलता प्राप्त हुई है।
    2. कभी लगता है कि नीले जल वाले सरोवर में किसी गोरी नायिका का शरीर झिलमिला रहा है। कवि की कल्पना अत्यंत नवीन है। सूर्योदय होने पर उषा का यह जादू टूटने लगता है।
    3. कवि ने उषाकालीन वातावरण को हमारी आँखों के सामने साकार रूप में उपस्थित कर दिया है। ‘गोर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो’ में उपमा अलंकार है। उत्प्रेक्षा और मानवीकरण अलंकारो का प्रयोग है। तत्सम शब्दावली का प्रयोग है।

    Question 26
    CBSEENHN12026244

    निम्नलिखित काव्याशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कीजिए-
    प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
    भोर का नभ
    राख से लीपा हुआ चौका
    (अभी गीला पड़ा है)
    बहुत काली सिल जरा से लाल केसर से
    कि जैसे धुल गई हो
    स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
    मल दी हो किसी ने
    नील जल में या किसी की
    गौर झिलमिल देह
    जैसे हिल रही हो।
    और जादू टूटता है, इस ऊषा का अब
    सूर्योदय हो रहा है

    1. काव्याशं में प्रयुक्त उपमानों का उल्लेख कीजिए।
    2. पद्यांश की भाषागत दो विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
    3. भाव-सौदंर्य स्पष्ट कीजिए:
        नील जल में या किसी की 
        गौर झिलमिल देह
        जैसे हिल रही हो।

     

    Solution

    1. काव्यांश में प्रयुक्त उपमान
       नीला शंख जैसा प्रात: का नभ
       राख से लीपा हुआ चौका जैसा भोर का नभ
       गौर झिलमिल देह जैसे

    2. इस पद्यांश की दो भाषागत विशेषताएँ हैं:।
      (i) सरल, सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।
      (ii) बिंबात्मक एवं चित्रात्मक भाषा का प्रयोग है।
    3. इन पंक्तियों में सूर्योदय की वेला के प्राकृतिक सौंदर्य की मनोहारी झलक प्रस्तुत की गई है। आकाश में क्षण- क्षण परिवर्तित होते सौंदर्य के रूप-चित्रण में कवि को सफलता प्राप्त हुई है। कभी लगता है कि नीले जल वाले सरोवर में किसी गोरी नायिका का शरीर झिलमिला रहा है। कवि की कल्पना अत्यंत नवीन है। सूर्योदय होने पर उषा का यह जादू टूटने लगता है।
    कवि ने उषाकालीन वातावरण को हमारी आँखों के सामने साकार रूप में उपस्थित कर दिया है। उत्प्रेक्षा और मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग है।

     

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