शमशेर बहादुर सिंह

  • Question 13
    CBSEENHN12026231

    भोर का नभ

    राख से लीपा हुआ चौका

    (अभी गीला पड़ा है)

    नई कविता में कोष्ठक, विराम-चिन्हऔर पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।

    Solution

    कोष्ठक में दिया गया है-’अभी गीला पड़ा है’ कवि भोर के नभ में राख से लीपे हुए चौके की संभावना व्यक्त करता है। आसमान राख के रंग जैसा है। यह चौका प्रात:कालीन ओस के कारण गीला पड़ा हुआ है। अभी वातावरण में नमी बनी हुई है। इसमें पवित्रता की झलक प्रतीत होती है। कोष्ठक में लिखने से चौका का स्पष्टीकरण हुआ है।

    Question 14
    CBSEENHN12026232

    अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त का शब्दचित्र खींचिए।

    Solution

    सूर्योदय

    लो पूर्व दिशा में उग आया

    सूरज

    लाल-लाल गोले के समान

    चारों ओर लालिमा फैलती चली गई

    और सभी प्राणी जड़ से चेतन

    बन गए।

    सूर्यास्त

    सूरज हुक्के की चिलम जैसा लगता है,

    इसे किसान खींच रहा है

    पशुओं के झुंड चले आ रहे हैं

    और पक्षियों की वापिसी की उड़ान

    तेज हो चली है

    धीरे-धीरे सब कुछ अदृश्य

    हो चला है

    और

    सूरज पहाड़ की ओट दुबक गया।

    Question 15
    CBSEENHN12026233

    सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ आगे बॉक्स में दी जा रही हैं। ‘उषा’ कविता के समानांतर इन कविताओं को पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषण कीजिए और यह भी बताइए कि कौन-सी कविता आपको ज्यादा अच्छी लगी और क्यों?

    ● उपमान ● शब्दचयन ● परिवेश

    Solution

    बीती विभावरी जाग री!

    अंबर पनघट में डुबो रही-

    तारा-घट ऊषा नागरी।

    खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,

    किसलय का अंचल डोल रहा,

    लो यह लतिका भी भर लाई-

    मधु मुकुल नवल रस गागरी।

    अधरों में राग अमंद पिए,

    अलकों में मलयज बंद किए-

    तू अब तक सोई है आली

    अस्त्रों में भरे विहाग री।

    - जयशंकर प्रसाद

    भोर का बावरा अहेरी

    पहले बिछाता है आलोक की

    लाल-लाल कनियाँ

    पर जब खींचता है जाल को

    बाँध लेता है सभी को साथ:

    छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी

    डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल

    उड़ने जहाज,

    कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले

    तारघर की कटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी

    बेपनाह काया को:

    गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी

    पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रेखा को

    और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दंड चिमनियों को जो धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी।

    -सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

    उत्तर: इन तीनों कविताओं में हमें जयशंकर प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ सबसे ज्यादा अच्छी लगी। इसके कारण ये हैं-
    इस कविता में प्रात:कालीन वातावरण साकार हो उठा है। यह ‘उषा’ और ‘बावरा अहेरी’ कविताओं से ज्यादा स्पष्ट है।

    मानवीकरण ‘उषा’ कविता में भी है और ‘बीती विभावरी’ में भी है। यह ‘बावरा अहेरी’ में भी है। पर ‘बीती विभावरी’ कविता में प्रकृति का मानवीकरण अधिक प्रभावी बन पड़ा है। इस पूरी कविता में मानवीकरण है।

    शब्द-चयन की दृष्टि से भी ‘बीती विभावरी’ कविता श्रेष्ठ है। इस कविता के शब्द बोलते जान पड़ते हैं-

    खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा

    अधरों में राग अमंद पिए।

    आँखों में भरे विहाग री।

    इस कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग देखते ही बलता है।

    Question 16
    CBSEENHN12026234

    ‘उषा’ कविता में प्रातःकालीन आकाश की पवित्रता, निर्मलता और उज्ज्वलता के लिए प्रयुक्त कथन को स्पष्ट कीजिए।

    Solution

    ‘उषा’ कविता में प्रात:कालीन आकाश की पवित्रता के लिए कवि ने उसे ‘राख से लीपा हुआ चौका’ कहा है। जिस प्रकार चौके को राख से लीपकर पवित्र किया जाता है, उसी प्रकार प्रात:कालीन उषा भी पवित्र है।

    आकाश की निर्मलता के लिए कवि ने ‘काली सिल जरा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो’ का प्रयोग किया है। जिस प्रकार काली सिल को लाल केसर से धोने से उसका कालापन समाप्त हो जाता है और वह स्वच्छ निर्मल दिखाई देती है, उसी प्रकार उषा भी निर्मल, स्वच्छ है। उज्ज्वलता के लिए कवि ने ‘नील जल में किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो’ कहा है। जिस प्रकार नीले जल में गोरा शरीरी कांतिमान और सुंदर (उज्ज्वल) लगता है, उसी प्रकार भोर की लाली में (सूर्योदय में) आकाश की नीलिमा कांतिमान और सुंदर लगती है।

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