विष्णु खरे

  • Question 9
    CBSEENHN12026624

    एक होली का त्योहार छोड़ दें तो भारतीय परंपरा में व्यक्ति के अपने पर हँसने, स्वयं को जानते-बूझते हास्यास्पद बना डालने की परंपरा नहीं के बराबर है। गाँवों और लोक-संस्कृति में तब भी वह शायद हो, नगर-सभ्यता में तो वह थी ही नहीं। चैप्लिन का भारत में महत्त्व यह है कि वह ‘अंग्रेजों जैसे’ व्यक्तियों पर हँसने का अवसर देते हैं। चार्ली स्वयं पर सबसे ज्यादा तब हँसता है जब वह स्वयं को गर्वोन्मत्त, आत्म-विश्वास से लबरेज, सफलता, सभ्यता, संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति, दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ, अपने को ‘वज्रादपि कठोराणि’ अथवा ‘दूनी कुसुमादपि’ क्षण में दिखलाता है।

    1. होली का त्यौहार किस रूप में क्या अवसर प्रदान करता है?
    2. अपने पर हंसने के सदंर्भ में लोक-सस्कृति एवं नगर-सभ्यता में मूल अतंर क्या था और क्यों?
    3. ‘अंग्रेजों जैसे व्यक्तियों’ वाक्यांश में निहित व्यंग्यार्थ को स्पष्ट कीजिए।
    4. चार्ली जिन दशाओं में अपने पर हंसता है, उन दशाओं में ऐसा करना अन्य व्यक्तियों के लिए संभव क्यों नहीं है?




    Solution

    1. होली का त्यौहार व्यक्ति को अपने पर हँसने तथा मौज-मस्ती करने का अवसर प्रदान करता है।
    2. अपने पर हँसने के संदर्भ में लोक-संस्कृति एवं नगर सभ्यता में मूल अंतर यह था कि लोक-संस्कृति में तो इसके अनेक अवसर थे पर नगर सभ्यता में ये अवसर मिलते ही न थे। वह एक ओढ़ी हुई गंभीरता होती है।
    3. ‘अंग्रेजों जैसे व्यक्तियों’ वाक्यांश में निहित व्यंग्यार्थ यह है कि बनावटी जिदंगी जीने वाले व्यक्तियों अर्थात् जो हैं तो भारतीय पर अंग्रेजी सभ्यता के प्रभावस्वरूप स्वयं को अंग्रेज सिद्ध करने पर तुले हुए हैं।
    4. चार्ली जिन दशाओं में अपनै पर हँसता है उन दशाओं में ऐसा करना अन्य व्यक्तियों के लिए संभव इसलिए नहीं है क्योंकि इसमें अत्यधिक आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है।

    Question 10
    CBSEENHN12026627

    लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा?

    Solution

    चैप्लिन एक महान कलाकार थे। उन्होंने समाज और राष्ट्र के लिए बहुत कुछ किया। दुनिया के अनेक लोग उन्हें पहली बार देख-समझ रहे हैं। यद्यपि पिछले 75 वर्षों में चार्ली के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, पर अभी भी बहुत कुछ कहना शेष है। अभी चैप्लिन की कुछ ऐसी फिल्में तथा रीलें मिली हैं जो कभी इस्तेमाल नहीं की गई। इनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता। अभी इनकी जाँच-पड़ताल होनी शेष है। दुनिया के लोग उन पर नए दृष्टिकोण से विचार कर रहे हैं। इन सब कामों में अभी 50 वर्षो का समय लग सकता है। अत: अभी अगले 50 वर्षो में काफी कुछ लिखा जाएगा।

    Question 11
    CBSEENHN12026629

    चैप्लिन ने न सिर्फ़ फि़ल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने और वर्ण व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?

    Solution

    लोकतांत्रिक बनाने का अर्थ है-फिल्मों को हर वर्ग तक पहुँचाना। चार्ली से पहले तक फिल्में एक खास वर्ग तक सीमित थीं। उनकी कथावस्तु भी एक वर्ग विशेष के इर्द-गिर्द घूमती थी। चार्ली ने समाज के निचले तबके को अपनी फिल्मों में स्थान दिया। उन्होंने फिल्म कला को आम आदमी के साथ जोड़कर लोकतांत्रिक बनाया।

    वर्ण व्यवस्था को तोड़ने से अभिप्राय है-फिल्में किसी जाति विशेष के लिए नहीं बनतीं। इसे सभी वर्ग देख सकते हैं।

    हम लेखक की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। कला सभी के लिए होती है। इस पर किसी वर्ग विशेष का एकाधिकार नहीं होना चाहिए।

    Question 12
    CBSEENHN12026630

    लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गांधी और नेहरू ने भी उनका सान्निध्य क्यों चाहा?

    Solution

    लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण राजकपूर को कहा। राजकपूर की फिल्म ‘आवारा’ सिर्फ ‘दि ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद ही नहीं थी बल्कि चार्ली का भारतीयकरण ही था। राजकपूर ने चैप्लिन की नकल करने के आरोपों की कभी परवाह नहीं की।

    महात्मा गाँधी से चार्ली का खासा पुट था। एक समय था जब गाँधी और नेहरू दोनों ने चार्ली का सान्निध्य चाहा था। उन्हें चार्ली अच्छा लगता था। वह उन्हें हँसाता था।

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