विष्णु खरे

  • Question 5
    CBSEENHN12026612

    निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये:-
    चार्ली पर कई फिल्म समीक्षकों ने नहीं, फिल्म कला के उस्तादों और मानविकी के विद्वानों ने सिर धुनें हैं और उन्हें नेति-नेति कहते हुए भी यह मानना पड़ता है कि चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा है। दरअसल सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सिद्धांत या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है, जो करोड़ों लोग चार्ली को देखकर अपने पेट दुखा लेते हैं उन्हें मैल ओटिंगर या जेम्स एजी की बेहद सारगर्भित समीक्षाओं से क्या लेना-देना? वे चार्ली को समय और भूगोल से काट कर देखते हैं और जो देखते हैं उसकी ताकत अब तक ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। यह कहना कि वे चार्ली में खुद को देखते हैं दूर की कौड़ी जाना है लेकिन बेशक जैसा चार्ली वे देखते हैं वह उन्हें जाना-पहचाना लगता है, जिस मुसीबत में वह अपने को हर दसवें सेकंड में डाल देता है वह सुपरिचित लगती है। अपने को नहीं लेकिन वे अपने किसी परिचित या देखे हुए को चार्ली मानने लगते हैं।

    1. चार्ली पर समीक्षकों को क्या मानना पड़ता है?
    2. कला और सिद्धात के बारे में क्या बताया गया है?
    3. समीक्षक चार्ली को किस प्रकार से देखते हैं?
    4. चार्ली कैसा लगता है?



    Solution

    1. चार्ली पर फिल्म समीक्षकों तथा विद्वानों ने अपना सिर धुना है और कहा है कि चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा है अर्थात् बहुत कुछ लिखा जा रहा है। पर यह सच नहीं है अभी उन पर काफी लिखा जाना शेष है।
    2. सिद्धांत कला को उत्पन्न नहीं करते। इसके विपरीत कला या तो स्वयं अपने सिद्धांत लेकर आती है या सिद्धांतों का निर्माण बाद में किया जाता है।
    3. समीक्षक चार्ली को समय और भूगोल से काटकर देखते हैं। वे जो देखते हैं उसकी ताकत अब तक वैसी ही बनी हुई है जैसी पहले थी।
    4. चार्ली उन्हें जाना-पहचाना लगता है। वह अपने को हर दसवें सेकंड में जिस मुसीबत में डाल देता है वह सुपरिचित सी लगती है। वे देखे हुए व्यक्ति को चार्ली मानने लगते हैं।

    Question 6
    CBSEENHN12026615

    निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये:-
    भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र को कई रसों का पता है, उनमें से कुछ रसों का किसी कलाकृति में साथ-साथ पाया जाना श्रेयस्कर भी माना गया है, जीवन में हर्ष और विषाद आते रहते हैं यह संसार की सारी सांस्कृतिक परंपराओं को मालूम है, लेकिन करुणा का हास्य में बबल जाना एक ऐसे रस-सिद्धांत की माँग करता है जो भारतीय परंपराओं में नहीं मिलता। ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ में जो हास्य है वह ‘दूसरों’ पर है और अधिकांशत: वह परसंताप से प्रेरित है। जो करुणा है वह अक्सर सदव्यक्तियों के लिए और कभी-कभार दुष्टों के लिए है। संस्कृत नाटकों में जो विदूषक है वह राजव्यक्तियों से कुछ बदतमीजियों अवश्य करता है, किंतु करुणा और हास्य का सामंजस्य उसमें भी नहीं है। अपने ऊपर हँसने और दूसरों में भी वैसा ही माद्दा पैदा करने की शक्ति भारतीय विदूषक में कुछ कम ही नजर आती है।

    1. भारतीय कला एवं सौंदर्यशास्त्र के बारे में क्या बताया गया है?
    2. भारतीय परपंराओं में क्या नहीं मिलता?
    3. रामायण और महाभारत का हास्य कैसा है?
    4. सस्कृंत नाटकों में विदूषक क्या काम करता है? उसमें क्या कमी नजर आती है?





    Solution

    1. भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र के बारे में यह बताया गया है कि इसमें कई रसों का उल्लेख है। इनमें से कुछ रसों का किसी कलाकृति में पाया जाना अच्छा समझा जाता है।
    2. भारतीय परंपराओं में ऐसा रस-सिद्धांत नहीं मिलता जो करुणा को हास्य में बदल सके। जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं।
    3. ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में जो हास्य है वह दूसरों पर है और अधिकतर वह परसंताप से प्रेरित है। वहाँ जो करुणा है वह तो अच्छे लोगों के लिए है और कभी-कभार दुष्टों के लिए भी दिखाई दे जाती है।
    4. संस्कृत नाटकों में जो विदूषक होता है वह शासक वर्ग के व्यक्तियों के साथ बदतमीजी करता है पर उसमें करुण और हास्य का सामंजस्य नहीं होता। अपने ऊपर हँसने की क्षमता का उसमें अभाव होता है।

    Question 7
    CBSEENHN12026617

    निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उत्तर दीजिये- 
    इसलिए भारत में चैप्लिन के इतने व्यापक स्वीकार का एक अलग सौंदर्यशास्त्रीय महत्व तो है ही, भारतीय जनमानस पर उसने जो प्रभाव डाला होगा उसका पर्याप्त मूल्यांकन शायद अभी होने को है। हास्य कब करुणा में बदल जाएगा और करुणा कब हास्य में परिवर्तित हो जाएगी इससे पारंपरीण या सैद्धांतिक रूप से अपरिचित भारतीय जनता ने उस ‘फिनोमेनन’ को यूँ स्वीकार किया जैसे बतख पानी को स्वीकारती है। किसी ‘विदेशी’ कला-सिद्धांत को इतने स्वाभाविक रूप से पचाने से अलग ही प्रश्न खड़े होते हैं और अंशत: एक तरह की कला की सार्वजनितकता को ही रेखांकित करते हैं।
    1. अभी चार्ली के बारे में क्या कुछ होना शेष है?
    2. क्या किसमें परिवर्तित हो जाता है?
    3. इसे भारतीय जनता किस रूप में स्वीकार करती है?
    4. हम कला की किस बात को रेखांकित करते हैं?


    Solution

    1. अभी चार्ली के भारत में व्यापक स्वीकार किए जाने का पता चला है, पर उसने भारतीय जनमानस पर जो व्यापक प्रभाव डाला है, उसका पर्याप्त मूल्यांकन होना अभी शेष है।
    2. हास्य करुणा में और करुणा हास्य में परिवर्तित हो जाता है। ऐसा कब और क्यों होता है, यह प्रश्न विचारणीय है।
    3. सैद्धांतिक रूप से अपरिचित भारतीय जनता इस फिनोमेनन (प्रघटना) को इस प्रकार स्वीकार करती है जैसे बतख पानी को स्वीकार करती है।
    4. हम एक तरह की कला की सार्वजनिकता को ही रेखांकित करते हैं।




    Question 8
    CBSEENHN12026621

    अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम चार्ली के टिली ही होते हैं जिसके रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। हमारे महानतम क्षणों में कोई भी हमें चिढ़ाकर या लात मारकर भाग सकता है। अपने चरमतम शूरवीर क्षणों में हम क्लैव्ज औश्र पलायन के शिकार हो सकते हैं। कभी-कभार लाचार होते हुए जीत भी सकते हैं। मूलत: हम सब चार्ली हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते। सत्ता, शक्ति, बुद्धिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों में जब हम आइला देखते हैं तो चेहरा चार्ली-चार्ली हो जाता है।

    Solution

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